मंदिर का परिचय

आदि शक्ति माँ मड़वारानी दाई के पावन स्थल की भौगोंलिक स्थिति:-
आदिशक्ति पर्वतवासिनी माँ मड़वारानी दाई के पावन स्थान का भौगोलिक स्थल का विवरण राजस्व एवं मानचित्र के आधार पर भारत गणराज्य के प्रांत छत्तीसगढ़ राज्य के जिला-कोरबा, तहसील करतला, पुलिस चौकी उरगा व जिला-कोरबा,के अंतर्गत उपतहसील क्षेत्र बरपाली के राजस्व ग्राम मड़वारानी (खरहरी), बीरतराई, महोरा, झीका, कुररहीया, भैसामुडा, सन्डैल, बरपाली, पुरेना, परसाभांठा, जर्वे के आम निस्तार एवं उपयोग में माता मड़वारानी दाई के निवास स्थल मड़वारानी पहाड़ की चोटी पर स्थित है। मड़वारानी पहाड़ कोरबा चाम्पा मुख्य सड़क मार्ग से मड़वारानी(खरहरी) ग्राम से कोरबा चाम्पा मुख्य सड़क के बीरतराई, नाका, भाठापारा महोरा होकर झीका से एवं कुररहीया,भैसामुडा, संन्डैल, बरपाली से तथा पुरेना से जाने के लिए माता मड़वारानी के पावन स्थल पर जाने हेतु पगडंडी रास्ता था, जो बिहड जंगलों मे पार करके जाना होता था, आने जाने के लिए कोई स्थाई रास्ता नहीं था, आने जाने में पहाड़ के कई मार्गों में भटकते- भटकते जाना पड़ता था, उस समय पहाड़ उपर स्थित ऊंचे-ऊंचे पेड़ एवं पत्थर चटृटान को ही आधार मानकर चलते थे तथा उसी के आधार पर आने-जाने का मार्ग था। बीरतराई के पहाड़ के नीचे-नीचे महोरा के बस्ती के उपर पहाड़ वालीनाला, झोरखा को पार करते हुए झीका के उपर कटीले मार्ग से होते हुए माता के स्थान पर पहाड़ उपर पहुंचते थे तथा खरहरी, जर्वे से नीचे से पुरेना, बरपाली के आगे पहाड़ किनारे जो सन्डैल, भैसामुडा, कुररहीया के पास चुहरी से जाते थे तथा ग्राम वासियों द्वारा निस्तार लकड़ी, पशुओं के चारागाह एवं आम निस्तार, लकड़ी, पशुओं के चारागाह एवं आम निस्तार के रास्ते से आना-जाना करते थे। इसी के आधार पर माता के पावन स्थल पर पहुचने का मार्ग, रास्ता, पगडंडी का जो नाला,पत्थर, झाड़ी से अव्यवस्थित था। उक्त मड़वारानी पहाड़ घने काले जंगल जहाँ माता मड़वारानी दाई के चोटियों से ठीक नीचे देखने पर हसदेव नदी है। तथा पहाड़ के अंतिम छोर के अगल-बगल पूर्णतः खाई है जो पत्थर के चट्टान हैं उसमे नीचे उतरने या चढनें का कोई स्थान नही है नीचे पर्णतः खाई है, इसी अंतिम स्थल पर माता का स्थान है जहाँ पर पहले का कलमी का पेड़ था जहाँ पर बेल के वृक्ष चारों तरफ फैले हुए हैं तथा उस कलमी पेडत्र के स्थान पर छोटा मंदिर था जिसका अभी वर्तमान में भव्य मंदिर नवनिर्माण कार्य पिंण्ड मूल स्थान पर निर्मित हो रहा है। पहले वहाँ जाने के लिए थोड़ा सा नीचे उतरने पर खाई स्थल को थीपापानी कहते है जो जो बारो मास पानी बूंद-बूंद कर सीचता रहता है जो माता की कृपा से है। पहाड़ उपर ही कई छोटे बड़े पहाड़ है। जिसके बीचो बीच बड़ी-बड़ी खाई सहित नाला है जो देखने एवं चढ़ने में अत्यंत दुर्गम स्थान तथा चारों तरफ पहाड़ है। पहाड़ के नीचे मुख्य कोरबा चंापा मार्ग पर आने से सोन नदी है। माता के पावन स्थान मड़वारानी पहाड़के चारों तरफ प्राकृतिक सौंदर्य,शक्ति विराजमान है। उस आदिशक्ति माता के पावन स्थल के सामने में उस स्थान तालाब पहाड़ में था जहाँ माता जी स्नान करती थी वर्तमान में तालाब नही है। 
पहाड़ उपर पत्थर के चट्टान जो सुरंग में बना है जिसे बड़े खेलिया कहते हैं वहा पर जंगल में विचरण करने वाले जीव जंतु विचरण करते थे पहाड में एक स्थान पर बहोत ज्यादा सराई का वृझो से आच्छादित है जिसे सरैया कहते है जहां कि जंगल में रहने वाले जन्तु विचरण करते है। जिनके साक्षात दर्शन एवं पद चिन्ह हमेशा मिलते थे जिसमें शेर (बाघ) था जो माता की सवारी है उसका दर्शन एवं पद चिन्ह को देखने के मिलते थे, जिसे शेर (बाघ) के नाम से डरते थे लेकिन माता की सवारी का पदचिन्ह देखकर प्रणाम कर आत्मा सन्तुष्टी मिलती थी। यहां बंदर,छोटे बड़े सभी प्रकार के मिलते है। पहाड़ ऊपर ही विशाल रूप में फैले है जो बडे-बड़े पेड़ एवं नाला झरोखा से बने गडढ़े जो पत्थर को काटकर कुएं की तरह बना उसमें जो पानी दिखता है वह काला हैं। लेकिन उस पानी को उस कुंड से बाहर निकालने पर वह साफ स्वच्छ एवं मीठा जल है। जो स्वादिष्ट एवं औषधी की तरह है, जिसे पीने पर शरीर की सम्पूर्ण थकान दूर हो जाती है और तरो ताजा हो जाती है। 
मड़वारानी पहाड़ के स्थल से नीचे के बाद सीधे रास्ते में दाहिने दिशा में जाने पर पहाड़ है उसे जालादारी कहते है। पूर्व में जहां घने जंगल होने से आस पास के जो जंगली पशुओं जानवरों का शिकार करते थे वे लोग यहाँ आकर अपनी जाल को फैलाते थे एक ओर से घेरते हुए जाने पर मनमुग्ध पशु उस जाल में फस जाते हैं इस कारण इस स्थान को जालाद्वारी कहते हैं। बीरतराई भाटापारा के पहाड़ के ठीक मोड में चिराई खोल है, जहां बडे-बडे घने पेड़ एवं पक्षी अधिक रहते थे तथा उस स्थान पर गिद्राईल,सुआ, गेटूर नामक पक्षी बहुत अधिक थी। उसी के पास हाथी जैसे बहुत बड़े चट्टान की पत्थर है। तथा वहां पर पत्थर के चट्टान के नीचे सुरंगे है जहां अंदर नीचे खाली जगह है जहां पर अंधेरा काला स्थान है कितना लम्बा स्थान है अभी तक ठीक-ठीक पता नहीं चल पाया है। बीरतरई गांव के ठीक उपर चीतवामाडा है जहां पुराने जमाने पर चीता निवास करता था, जंगल कटने पर वर्तमान केवल गिदराईल पक्षी, मयुर, खरगोस अन्य पशु पक्षी रहते है चीतामाडा मे अंदर माडा है पहाड़ पर स्थित उपर चट्टान के बाद पेड वृक्ष है लेकिन ठीक नीचे काले पत्थर का चट्टान है जिसके नीचे दो बड़े-बड़े सुरंग है जहां चीता बैठकर आराम करता था इस कारण उसे चीतामाडा कहते हैं। 
पहाड़ के ठीक नीचे बीरतराई ग्राम है जो पुरातत्व की धरोहर है, यहां पुराने वर्षो मे देवराज (देवस्थल) के पास कुण्ड़ थ जिसे अमृत कुंड कहते थे जो व्यक्ति उस कुंड के पानी को पी लेता था वह अधिक बलवान हो जाता थ तथा उस कुंड के पानी को जिस हथियार ने छुआने के बाद वह धारदार हो जाता था तथा बड़े से बडे वृक्ष को काटा करता था अमृत कुंड के पानी को पीकर बलवान हो जाते थे तथा वह अपनी उस ताकत का दुरूपयोग करने लगे तथा उस कुंड को पाट दिया गया। वही पर बडकामुड़ा नामक बहुत बड़ा तालाब है जो पहाड़ के ठीक नीचे है उस पहाड़ के नीचे में देव स्थान है जहां पर छहमाषी रात में मंदिर निर्माण हो रहा था, मंदिर बनाते-बनाते निर्माण में उपयोग होने वाले छीनी कही गिर गया जिसे बहुत ढूंढते रहे थे तथा मंदिर निर्माण का शर्त था कि अंधेरी रात में निर्माण होना था यदि प्रकाश जलाने पर शर्तें के अनुसार निर्माण ध्वस्त हो जावेगा लेकिन मंदिर निर्माण में उपयोग होने वाले छिनी को ढूंढने के लिए प्रकाश जलाया गया जैसे ही प्रकाश फैला मंदिर निर्माण ध्वस्त हो गया तथा उसके अवशेष अगल बगल में बिखर गयी मंदिर में स्थापित होने वाले देवी देवता की मूर्ति यत्र-तत्र मिट्टी टीला में दबा हुआ है तथा कृषकों के खेत में भी दूर-दूर तक फैले है जो कृषक खेमनलाल के खेत की खोदाई करने पर, खेती करने पर, खेती करने से जमीन के नीचे पड़े भूमि पर राम-सीता, लक्ष्मण, भरत मिलन, गणेश, शीतला मां, हाथी, घोड़ा, विष्णु भगवान, कलश, गंगार के साईज की निकली है। जिसमें से कुछ मुर्ति पुरातत्व विभाग द्वारा धरोहर के रूप में रखने के लिए कोरबा स्थित पुरातत्व संग्रालय में लाये हैं तथा शेष बडकामुडा तालाब में स्थित प्राचीन मंदिर में रखे है तथा शिवलिंग को कनकी ले जा रहे थे तो सात बार बैलगाडी टुटा एवं शिवलिंग भी दो टुकडा हो गया जिसमें एक हिस्सा कनकी के मंदिर में है दुसरा हिस्सा बीरतराई स्थित शंकर भगवान की मंदिर है तथा बोईरहा तालाब में कालीमाता एवं तालवा में भईसासुर सर्पिन, सत बहिनिया के पूजा तथा ठाकुर देवता के पूजा अर्चना आज भी होते आ रहा है, बताते है कि संसार के अढ़ाई दिन के खर्चा, धन दौलत देउर स्थान जहां मंदिर का निर्माण हो रहा था वहाँ स्थित है। 
मुख्यमार्ग कोरबा-चाम्पा के मडवारानी पहाड के किनारे में खरहरी ग्राम स्थित है, इस ग्राम में पानी का बहाव ठहर नहीं पाता था तथा वर्षा की पानी भी नही रूकता था, और पहाड़ से निकलने वाली पानी का बहाव खरहरी से निकल कर सोन नदी में बह जाने इस कारण इसे खरहरी कहते है यहां खरहरी पाठ में पूजा अर्चना होती है। 
पहाड़ के नीचे ग्राम पुरेना है जहां पहले पुरेनिया तालाब के पास ग्राम का बस्ती था, इस तालाब में सोने चांदी के बड़े-बड़े गंगार थे जिसकी सुरक्षा स्वयं माता जी करती थी उस तालाब में मछली पकड़ने लिए नाव लेकर जाने पर एक भी मछली नही मिलती थी एवं ऐसी ही पकडने पर मछली मिल जाती थी, कहते है कि सोन नदी के नरई दहरा से उड़द दाल को धोने से दाल के साथ छिलका प्रवाह में परेनिहा जर्वे तालाब में निकलता था। ठाकुर देव हैं खरहरी एवं पुरेना में पहाड़ कनारे पर कोठी खोला नामक स्थान जो भौगोलिक रूप से छत्तीसगढ़ के किसानों द्वारा खेती से उपज धान को रखने के लिए कोठी बने है कोठीखोला में बहुत बड़े-बड़े झाड़ है। वैसे ही पूरे क्षेत्र में विस्तार से देखने पर कोठीखोला से आवाज लगाने पर बाघमाडा में सुनाई पड़ता था। 
पुराने समय में बरपाली में बाजार बैठता था वहां से चुहरी जाने का रास्ता है चुहरी में पानी की श्रोत है जहां पानी महेशा मिलता है जहां पर भैंसामुडा, सन्डैल कुररीहा के लोग चुहरी होकर माता के स्थान पर जाते है उसके अलावा और रास्ता कुररीहा से नहीं है कुररीहा एवं झिका मड़वारानी पहाड़ के नीचे स्थित है जहां से सीधा जाने का रास्ता नही है पहाड़ से नीचे सीधे खाई है उसके बाद बस्ती बसा बसा है बस्ती के नीचे हसदेव नदी अपने करतल स्वर प्रवाहित होते चले आ रही है। माता मड़वारानी दाई के चरणों को धोकर प्रमाण कर रही है। प्राचीन समय में घने जंगल था कटिले रास्ते में बड़े-बड़े नाला था जिसके आवागमन दुर्गम था पगडंडी रास्ता एवं अंदाजा रास्ता अपनाकर चलना पड़ता था, कालन्त में माता की कृपा से माता की स्थल को स्थल को संधारण व्यक्ति करने के लिए समय-समय पर आस पास के ग्रामीणों की समूह एवं पुजारी बैगा द्वारा सभी मिलकर माता के द्वारा चरवाहा एवं आम लोगों को दिए सपने के अनुरूप पूजा पाठ करते चले आ रहे हैं।
वर्तमान में माता के श्रध्दालु भक्त के आने जाने के लिए सीधी, रास्ता, कच्ची, पक्की रोड, बिजली की व्यवस्था मंदिर एवं स्थल का नवनिर्माण किया गया। तथा मड़वारानी दाई के प्राचीन मंदिर का जिर्णोधार नव निर्माण कार्य प्रगति पर है। वर्तमान में माँ मड़वारानी सेवा एवं जनकल्याण समिति पंजीयन क्रमांक 368 वि.सं.जिला कोरबा का गठन कर समिति के द्वारा माता की कृपा से पैदल चलने के रास्ते कच्ची रोड़ का निर्माण जन सहयोग एवं शासन का कुछ सहयोग से किया गया है जिसमें नीचे मड़वारानी से पहाड़ उपर जाने का रास्ता का निर्माण किया गया, समिति के सचिव श्री विनोद साहू के नेतृत्व में पूर्वमंत्री श्री मेघाराम साहू से सम्पर्क कर माता के दर्शन हेतु श्रध्दालुओं की व्यवस्था माता की कृपा से की मेघाराम साहू ने मुख्यमंत्री रमन सिंह से घोषणा आम सभा में कराया गया। जिसके परिणाम स्वरूप 01 कि.मी.सी.सी.का निर्माण हुआ तथा पीने के पानी की व्यवस्था के घोषणा पर पाईप लाइन बिछाकर कुछ दूरी तक पानी की व्यवस्था किया गया है।
शासन के सहयोग से समिति के पूर्व सरंक्षक श्री पिताम्बर कंवर द्वारा एवं पहाड़ उपर हेड पंप बोर खुदाई का कार्य कराया गया जहां बोर से कम मात्रा में पानी मिलता रहता है।
मंदिर के पूर्व में पूजारी छत्तू भगत द्वारा जन सहयोग से सीढी की निर्माण कराया था तथा थीपा पानी को इकट्ठा कर लोगों को पीने के पानी की व्यवस्था के लिए स्थान को बनवाया था, कोरबा निवासी श्री के.एन.सिंह ने चुहरी से पहाड़ उपर जाने के लिए रास्ते पर सीढ़ी का निर्माण कराया है तथा मड़वारानी नीचे से पहाड़ उपर जाने के कच्ची रोड पर माँ मड़वारानी सेवा एवं जनकल्याण समिति द्वारा श्री संतोष सोनी की माता श्रीमती चन्द्रकली सोनी की स्मृति में हनुमान मंदिर का निर्माण किया गया है जिसमें श्री दुखीराम निषाद जी का विशेष सहयोग रहा एवं माता मड़वारानी दाई के पावन स्थल पर राम मंदिर का निर्माण हुआ है।
माता मड़वारानी दाई के पावन स्थल पर जन सहयोग से आस-पास के ग्रामीणों द्वारा मिलकर मंदिर बनवाया था जो पूर्व में छोटा था जिसे माँ मड़वारानी सेवा एवं जनकल्याण समिति मड़वारानी पंजीयन क्रं.368 ने बडे रूप से परिवर्तित किया है एवं श्रध्दालुओं के द्वारा निर्मित मंदिर परिसर को मां मड़वारानी दाई की कृपा से समिति के माध्यम से माता की कृपा पर भव्य रूप मे निर्मित किया जा रहा हैं। जहां माता के नवरात पर्व ज्योति कलष मनोकामना प्रज्जवलित होता है जिसका विसर्जन हसदेव नदी एवं सोन नदी में दोनो स्थान पर करते हैं ।
इस प्रकार से माँ मड़वारानी दाई के पावन स्थल मड़वारानी पहाड़ उपर स्थित है, जहां उसके तराई में बसे सभी ग्रामों की जनता की अराध्य देवी है जहां प्राकृतिक छटा, चारों ओर हरियाली दिखाई देती है। भौगोलिक रूप से गुगल में मड़वारानी दाई के पावन स्थल मंदिर एवं आवागमन की रास्ता परिलक्षित होती है जहां वर्तमान में रेल्वे स्टेशन मड़वारानी दाई के नाम पर बना है तथा मड़वारानी पहाड़ के नीचे बसे ग्राम खरहरी को अब मड़वारानी के नाम से जाना एवं पहचाना जाता है माता की कृपा से मुख्यमार्ग पर मड़वारानी दाई की मंदिर स्थापित किया गया है जो पहाड़ चढ़ने में परेशानी एवं रास्ता का अभाव था इस कारण स्थापित किया गया है।
मड़वारानी दाई की महिमा एवं अपार श्रध्दा के कारण तराई के सभी ग्रामों में मड़वारानी दाई की पुजा अर्चना धुम धाम से होती है इस कारण ग्राम कोथारी, बरपाली, सरगबुंदिया की एवं आस-पास के बहुत से ग्राम में माता मड़वारानी दाई की मंदिर निर्माणकर मड़वारानी दाई को स्थापित करके प्रतिदिन पुजा अर्चना करते है। माँ मड़वारानी के पावन स्थल पूर्णतः जंगलपर स्थित है। वर्तमान में वर्तमान पहाड के नीचे वाले सभी गांवों में पक्की सड़क, हेण्ड पंप, बिजली, स्कूल, के लिए रकम की व्यवस्था हो गई तथा पहाड़ के तरफ नीचे रोड पक्की-कच्ची स्थित है।

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